श्रीकृष्ण की कथा अब तक प्राय: नन्द तथा यशोदा के पक्ष से ही देखी जाती रही है। संस्कृत तथा हिन्दी साहित्य ने यशोदा के पक्ष से इस कथा को इतनी बार दुहराया है कि श्रीकृष्ण की मूल जननी देवकी तथा पिता वसुदेव दोनों साहित्य एवं इतिहास के हाशिए पर पहुँच गये हैं। इस उपन्यास में श्रीकृष्ण कथा को देवकी-वसुदेव के पक्ष से देखा गया है और यहाँ पूरी चेष्टा की गई है कि उन्हें हाशिये से उठाकर भारतीय साहित्य तथा इतिहास के मुखपृष्ठ पर स्थापित किया जाए। देवकी की कथा अगाध दु:ख से भरी करुणा के उन्मेष की कथा है और कारागार के प्राचीरों में घिरी असह्य पीड़ा भोगने वाली देवकी की जिजीविषा ही श्रीकृष्ण जैसे महान भागवत व्यक्तिव के निर्मित करने का मुख्य कारण और भारतीय संस्कृति को तेजोमय व्यक्तित्व—श्रीकृष्ण—प्रदान करने वाली देवकी व्यथा को उभारना ही इस उपन्यास का मन्तव्य है।

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