चित्रा मुद्गल मध्यवर्गीय स्त्री-जीवन की आकांक्षाओं और अभावों को गहरे भाव के साथ देखती-लिखती रही हैं। उनकी अनेक कहानियाँ मानक के रूप में देखी और सराही गई हैं।
अपने लम्बे साहित्यिक जीवन में उन्होंने न सिर्फ सामान्य अनुभवों से इतर कथाओं को सम्भव किया, बल्कि भाषा के स्तर पर भी अपनी एक विशिष्ट शैली ईजाद की। इस संग्रह की कुछ कहानियों में प्रयुक्त भाषा को देखते हुए कहा जा सकता है कि रचनाकार ने सिर्फ पात्रों के जीवन और आचार-व्यवहार का ही नहीं, उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टताओं का भी गहरा अध्ययन किया है।
उनकी इन कहानियों में उस स्त्री का स्वर सुनाई पड़ता है जो अपने जीवन को धीरे-धीरे बदलते हुए समाज को भी बदल रही है। पारिवारिक जीवन के तौर-तरीकों में विन्यस्त उत्पीड़न के बिम्बों को तो उन्होंने बारीकी से पकड़ा ही है।
‘दुलहिन’ चित्रा मुद्गल का सबसे पहला संग्रह जिसे उन्होंने अपने लेखकीय जीवन की पहली कृति के रूप में संकलित किया था।

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