यह कहानी है एक अद्भुत यात्रा की। इस यात्रा में एक यात्री तो हैं मोहनदास करमचन्द गांधी जो हाल ही में दक्षिण अफ्रीका से अपने देश भारत आए हैं। और फ़िलहाल अनिश्चय की स्थिति में हैं। वे दिशाभ्रम से जूझ रहे हैं, अकेलेपन के अहसास से घिरे हुए हैं; साथ ही, हताशा, निराशा एवं अवसाद से भी दो-चार हो रहे हैं। भारत पहुँचने के चार वर्ष बाद उनकी एक नई यात्रा शुरू होती है, जिस यात्रा में उनकी सहयात्री हैं सरलादेवी चौधरानी—गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भांजी। अत्यन्त सुन्दर एवं विदुषी इस महिला को उसकी जुझारू प्रवृत्ति के कारण बंगाल की ‘जोन ऑफ आर्क’ कहा जाता था। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें उन दिनों एक कद्दावर राष्ट्रीय नेता समझा जाता था। भारत की प्रथम महिला नेत्री के रूप में भी वे विख्यात हुईं। स्वामी विवेकानन्द ने एक पत्र में उन्हें लिखा था—‘वेदान्त में निष्णात आपके जैसी साहसी और प्रतिभाशाली महिलाएँ प्रचार करने यदि इंग्लैंड जाती हैं, मुझे विश्वास है कि हर साल सैकड़ों पुरुष और महिलाएँ भारतभूमि का धर्म अंगीकार कर धन्य हो जाएँगे। आपके जैसा कोई अगर जाए, इंग्लैंड हिल उठेगा, अमेरिका का तो कहना ही क्या।’
लेकिन यह यात्रा अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच पाई। क्या था वह गन्तव्य और क्यों रही यह यात्रा अधूरी? इन प्रश्नों के जवाब इस अत्यन्त रोचक पुस्तक को पढ़ने के पश्चात ही पाठक को मिल सकेंगे।

