चेकोस्लोवाकिया के पत्रकार, साहित्यालोचक और कम्युनिस्ट नेता जूलियस फ़ूचिक ने ‘फाँसी के तख़्ते से’ पुस्तक नाज़ियों की क़ैद में रहते हुए काग़ज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखी थी। बर्लिन की एक नात्सी अदालत तब उन्हें मौत की सज़ा सुना चुकी थी, और मृत्यु उनके सामने थी।
अदम्य साहस और भविष्य में अटल विश्वास की सूचक इस पुस्तक में न सिर्फ़ फ़ासिस्ट क्रूरताओं के भयावह चित्र दिखाई पड़ते हैं, बल्कि उस व्यक्ति के नैतिक बल की प्रेरक छवियाँ भी दिखाई देती हैं जो फ़ासिज़्म का शिकार ज़रूर था, लेकिन उससे हारा नहीं; इतिहास के सामने उस अमानवीय शक्ति को उसने मुजरिम के रूप में खड़ा किया; और उस पर फ़ैसला भी दिया।
दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी इस पुस्तक में फ़ूचिक ने अपनी मनस्थिति के अलावा तत्कालीन घटनाओं के बहाने अपने विचार भी प्रकट किए हैं और मनुष्यता के शान्तिपूर्ण भविष्य में अपना गहरा विश्वास और जीवन से अपने अटूट प्रेम को भी व्यक्त किया है।
माना जाता है कि यह पुस्तक उस लड़ाई में जोकि फ़ासिज़्म की बर्बरताओं के ख़िलाफ़ दुनिया में लड़ी गई, या लड़ी जा रही है; एक प्रेरक घटक के रूप में स्वीकार की जाती रही है।

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