गगन घटा घहरानी उपन्यास की पृष्ठभूमि में झारखंड है—पलामू और उसके आसपास के क्षेत्र; और पात्र हैं आदिवासी-सदान, महाजन और जमींदार।
महाजनी सामन्ती तंत्र में आम आदिवासी जन का जीवन अबाध शोषण और उत्पीड़न से आक्रान्त है। बेगार, पिटाई और बेदखली से लेकर बलात्कार तक, हर तरह का अत्याचार उनके दैनन्दिन जीवन का हिस्सा हैं। जमींदार किसी पर ज्यादा ही नाराज हो जाए तो उसे अपने पालतू चीते का भोजन भी बना देता है। और सरकार के हाकिम-हुक्काम भी किसके साथ खड़े होते हैं यह भी सबको पता है।
यही परिस्थितियाँ आखिरकार आदिवासियों को जमींदार की गढ़ी पर चढ़ाई करने के लिए विवश करती हैं। इस उपन्यास में जो वर्णित है वह किसी मध्ययुग की नहीं बल्कि हमारे ही समय की कहानी है। कोई पाँच दशक पहले उभरे उस आन्दोलन का जीवन्त औपन्यासिक चित्र, जिसे झारखंड के एक स्वतंत्र राज्य के रूप में गठन के आन्दोलनों की शृंखला से अलग कर नहीं देखा जा सकता।
आज भी आदिवासी जनजीवन नई चुनौतियों से रू-ब-रू है। उनकी अस्मिता और अधिकारों पर नये-नये खतरे मँडरा रहे हैं। ऐसे में यह उपन्यास एक अनिवार्य पाठ है जिसमें आदिवासियों की उस संघर्ष-परम्परा का अंकन है जिसे उन्होंने इतिहास के अपने लम्बे अनुभव से हासिल किया है, और जिसकी बदौलत वे शोषकों को पीछे धकेलते आए हैं।

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