‘हब्बा की खोज’ वक़्त के सदियों लम्बे धुन्धलके में खो-सी गई, एक शायर के जीवन-चिह्नों की तलाश का ऐसा वृत्तान्त है जिसमें इतिहास, आख्यान, शायरी और यायावरी एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। हब्बा ख़ातून के गीत, उसकी कहानियाँ कश्मीर के जनमानस में आज भी गहरे रचे-बसे हैं। वह उसे ‘बुलबुल-ए-कश्मीर’ कहकर याद करता है। ये सब बातें, ज़ाहिर है, बतलाती हैं कि कश्मीरी अवाम को चौदहवीं सदी की अपनी इस शायर से कितना लगाव है। लेकिन इतिहास के दायरे में जाते ही हब्बा का मसला पेचीदा हो जाता है—उसके बारे में कहानियाँ-किंवदन्तियाँ चाहे जितनी हों, निर्विवाद स्मारक और प्रामाणिक दस्तावेज़ लगभग नहीं मिलते। उनके क़ब्र तक को लेकर मतैक्य नहीं है— कुछ लोग कश्मीर में बताते हैं तो कई दूसरे लोग बिहार में।
इस उलझन ने ही गीताश्री को प्रेरित किया और वह हब्बा के सच का पता लगाने निकल पड़ीं। उन्होंने हब्बा से जुड़ी तमाम क़िस्सों-कहानियों को इकट्ठा कर उसके जीवन की एक सिलसिलेवार तसवीर उकेरने की कोशिश की। वह कश्मीर से बिहार तक उन तमाम जगहों पर बार-बार गईं जिनका वास्ता हब्बा से बताया जाता है, और वहाँ बचे निशानों को देखा-परखा। उसके गीत-गान जुटाए। इस तरह जो कुछ हासिल हुआ उसे ही उन्होंने ‘हब्बा की खोज’ में पेश किया है।
इसमें दावों से अधिक दीवानगी नज़र आती है। और यह दीवानगी अपने मक़सद में इस तरह कामयाब हुई है कि हब्बा की टुकड़े-टुकड़े बिखरी दास्तान एक साथ जुड़कर बहुत हद तक मुकम्मल हो गई है। एक विचारोत्तेजक किताब!

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