About Book
‘जीवन के अर्थ की खोज’ मनुष्य मात्र के होने, देखने, जीने, कर्म करने को सृष्टि के साथ जोड़कर देखती है। जीवन को यह बड़े फ़लक पर उत्स से पढ़ती है। अर्थ निर्मिति की संश्लिष्टता को विवेचित करने के लिए धर्म, मिथक, अध्यात्म, दर्शन और विज्ञान की स्थापनाओं से गुज़रती हुई प्राचीन और आधुनिक-उत्तर आधुनिक समय में जीवन और विकास की गति को केन्द्र में रखकर मानव-जीवन की खोज के सत्य पर रोशनी डालती है। इस किताब में विश्व लेखकों का मनुष्य सम्बन्धी जो गम्भीर अध्ययन है, विचारों का जो हासिल है, उसको आधार बनाकर अपनी दृष्टि का सम्यक उजागर है। वह एकायामी नहीं है।
इसमें जीवन-मरण के बीच जीवन स्पर्श, स्वर, आकार, स्मृति, गति, ठहराव, अस्मिता आदि के सवालों से ज़िरह है। लेखक ने मूलभूत प्रश्नों यथा प्रेम, करुणा, दुख, सुख, आनन्द, मनुष्यत्व, उत्थान-पतन, भौतिकता जैसे महत्त्वपूर्ण सन्दर्भों से गुज़रकर मनुष्य की खोज के जटिल पहलुओं को समझने की एक आधारभूमि चिन्तन के लिए प्रस्तुत की है। सहमति-असहमति अपनी जगह है। पंच महाभूतों के महत्त्व के साथ उनके मातृत्व, आनन्द, संगीत और सकारात्मक ऊर्जा की अभ्यर्थना को लेखक ने मनुष्यता के लिए अपरिहार्य माना है। मान-अपमान से रहित व्यक्ति ही ब्रह्म है। लेखक मानव की यात्रा को अबाध रूप में अभिहित करता है। यात्रा मंज़िल नहीं है। वह हर भागते पल में ठहराव का आनन्द और सत्य की परिभाषा है। मनुष्य वही है, मनुष्यता वही है जहाँ जीवन वैविध्य की खोज सृष्टि की संयुक्तता में निहित हो।
—लीलाधर मंडलोई