‘प्रेमगली’ एक शृंखला हो सकती है, ये गली में कुछ दूर जाने के बाद समझ में आया। ‘प्रेमगली अति साँकरी’ और ‘जिस्म जिस्म के लोग’ के बाद ‘झिलमिल’ लिखते हुए लगा कि अनजाने में ही ये एक शृंखला हो गई जिसमें मैं कड़ियाँ जोड़ता जा रहा हूँ, और शायद जोड़ता जाऊँगा—क्योंकि प्रेमगली सँकरी हो सकती है, ख़त्म नहीं हो सकती। यानी आने वाले वक़्त से उम्मीद हर उम्र में बनी रहनी चाहिए।

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