इस पुस्तक में प्रख्यात कथा-शिल्पी अमृतलाल नागर के साहित्यिक जीवन के अंतरंग संस्मरण उनके बालसखा ज्ञानचंद जैन ने लिखे हैं। वे पैंसठ बरस तक उनके मित्र और साथी रहे। उनकी मित्रता का सूत्रपात उस समय हुआ जब दोनों की अवस्था नौ-दस बरस थी और स्कूल में पाँचवें दर्जे में साथ पढ़ते थे। पढ़ने और लिखने में साथ-साथ रुचि उत्पन्न हो जाने से दोनों उत्तरोत्तर अभिन्न मित्रता की डोर में बँधते चले गए। दोनों ने साथ-साथ कहानी-लेखन आरंभ किया और साहित्यिक जीवन में प्रवेश किया। ज्ञानचंद जैन अमृतलाल नागर के संपूर्ण साहित्यिक जीवन के भी साक्षी रहे। उनकी रचना-यात्रा में अंतरंग सहयोगी रहे और उनकी प्रत्येक रचना के प्रथम श्रोता भी। लेखक के ‘दो शब्द’ के अनुसार—“उनके न रहने पर मेरे जीवन में जो सूनापन आया उसे भरने के लिए मैंने 1992 में इन संस्मरणों का लेखन आरंभ किया। एक बात यह भी मेरे मन में थी कि अमृतलाल नागर जिस साधना के बल पर, हम दोनों के मित्र डॉ. रामविलास शर्मा के शब्दों में, 'कथा-पंडित' बने, उसका विवरण कहीं मेरे साथ न चला जाए। इसलिए चींटी की चाल से लिखते हुए पुस्तक 15-12-95 को पूरी की।” निःसंदेह ये संस्मरण नागरजी के रचना और व्यक्ति-जीवन के कुछ अछूते कोणों पर प्रकाश डालेंगे।

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