प्रस्तुत पुस्तक में प्रसाद जी की साहित्यिक समीक्षाओं का संग्रह है। साहित्य भी एक सांस्कृतिक प्रक्रिया ही है; इसलिए हम देखते हैं कि प्रसाद जी ने इन निबन्धों में भारतीय दार्शनिक अनुक्रम का साहित्यिक अनुक्रम से युगपत् सम्बन्ध तो स्थापित किया ही है, प्रसंगवश दर्शन और साहित्य की समानता भी मानवात्मा के सम्बन्ध से सिद्ध की है। मुख्य-मुख्य दार्शनिक धाराओं के साथ मुख्य-मुख्य काव्य-धाराओं का समीकरण करके इन दोनों का एक इतिहास भी प्रसाद जी ने इस पुस्तक में हमारे सामने प्रस्तुत किया है।

Loading, please wait...

