— अवध के क़िस्सों की लम्बी यात्राएँ हैं। ये भगवान राम के साथ वन-वन घूमे
हैं, तो प्रवासी भारतीयों के साथ मारीशस, फ़िजी, गयाना आदि सुदूर देशों तक जाकर आज भी वहाँ सुने-कहे जा रहे हैं। श्रमिकों ने इन्हें खुले आसमान व वृक्षों के नीचे सुनाया, तो ग़रीबों ने झोंपड़ियों में और धनवानों ने महलों में, ऋषियों-मुनियों ने इन्हें वेदों, पुराणों, आरण्यक ग्रन्थों उपनिषदों, ‘रामायण’, ‘महाभारत’ आदि में अपनी शैली में समावेशित किया।
लोक साहित्य में विश्वासों में कोई सुदृढ़ तर्क योजना भले न दिखे, लेकिन, इनमें प्रतीक या अन्योक्ति की कई छवियाँ दिख जाती हैं। क़िस्सों में भूत-प्रेत, जादू-टोना, चमत्कार आदि का उल्लेख होता रहता है। इनका आनन्द लेकर इनमें उलझे बिना पाठक अपना अर्थ प्राप्त कर लेता है।
क़िस्से अवध के में सामाजिक सम्बन्धों का पूरा भूगोल दिखता है। इसे स्त्री-विमर्श और अस्मिता-विमर्श के दृष्टिकोण से भी पढ़ा जा सकता है। यह भी जाना जा सकता है कि भारतीय समाज की आन्तरिक संरचना में जाति और वर्ण आदि की सकारात्मक या नकारात्मक धारणाएँ क्या हैं?
इन क़िस्सों में शाश्वत मान्यताओं की पुष्टि रोचक ढंग से हुई है। इनमें सन्देश और मनोरंजन का मिला-जुला आस्वाद है।

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