प्रेमचन्द शताब्दियों से पददलित, अपमानित और निष्चेषित कृषकों की आवाज़ थे; पर्दे में क़ैद, पद-पद पर लांछित और असहाय नारी जाति की महिमा के ज़बर्दस्त वकील थे; ग़रीबों और बेकसों के महत्त्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ को जानना चाहते हैं तो प्रेमचन्द
से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता।
— आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

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