मुझे यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई है कि श्रीमती पुष्पा जैन ने ‘महाभारतकालीन समाज’ का सुन्दर हिन्दी अनुवाद किया है। इस पुस्तक के लेखक श्री सुखमय जी भट्टाचार्य मेरे बहुत निकट के मित्र हैं। मैने स्वयं देखा है कि उन्होंने कितने परिश्रम से इस ग्रन्थ की रचना की थी, कितनी बार उन्हें ‘महाभारत’ का पारायण करना पड़ा है, कितनी बार उन्हें एक वक्तव्य का दूसरे वक्तव्य से संगति मिलान के लिए माथापच्ची करनी पड़ी है, यह सब मेरे सामने ही हुआ है। वे बड़े धीर स्वभाव के गम्भीर विद्वान हैं। जब तक किसी समस्या का समाधान तर्कसंगत और सन्तोषजनक ढंग से नहीं हो जाता, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता। बड़े धैर्य, अध्यवसाय और उत्साह के साथ उन्होंने इस कठिन कार्य को सम्पन्न किया है। कार्य सचमुच कठिन था।
‘महाभारत’ भारतीय चिन्तन का विशाल विश्वकोश है। पंडितों में यह भी जल्पना-कल्पना चलती रहती है कि इसका कौन-सा अंश पुराना है, कौन-सा अपेक्षाकृत नवीन। कई प्रकार की समाज व्यवस्था का पाया जाना विभिन्न कालों में लिखे गए अंशों के कारण भी हो सकता है। फिर इस ग्रन्थ में अनेक श्रेणी के लोगों के आचार-विचार की चर्चा है। सब प्रकार की बातों की संगति बैठना काफ़ी कठिन हो जाता है। पं. सुखमय भट्टाचार्य जी ने समस्त विचारों और व्यवहारों का निस्संग दृष्टि से संकलन किया है। पाठक को अपने निष्कर्ष पर पहुँचने की पूरी छूट है। फिर भी उन्होंने परिश्रमपूर्वक निकाले अपने निष्कर्षों से पाठक को वंचित भी नहीं रहने दिया, इसीलिए यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करके श्रीमती पुष्पा जैन ने उत्तम कार्य किया है। इस अनुवाद के लिए वे सभी सहृदय पाठकों की बधाई की अधिकारिणी हैं।
—हजारीप्रसाद द्विवेदी

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