‘मंजुशिमा’ शिवप्रसाद सिंह के उपन्यासों में अपनी अलग जगह रखता है। शिल्प के लिहाज से देखें तो यह रचना जीवनी, आत्मकथा, डायरी और संस्मरण आदि विधाओं को मिलाते हुए अपना औपन्यासिक वितान रचती है।
कथा के केन्द्र में लेखक की पुत्री है, जो अचानक ही बीमार पड़ जाती है। जाँच-पड़ताल के बाद पता चलता है कि उसकी दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं। यहीं से शुरू होता है पिता का संघर्ष। धीरे-धीरे यह संघर्ष सिर्फ अपनी बेटी को बचाने का संघर्ष नहीं रहता, बल्कि मृत्यु के विरुद्ध जीवन का, नियति के विरुद्ध मानवीय जिजीविषा का युद्ध हो जाता है। बेटी के जीवन के लिए किसी भी हद तक जाकर इस उपन्यास का पिता समाज के सामने यह भी स्पष्ट कर देता है कि बाकी लोगों की सोच के विपरीत उसके लिए बेटी का जीवन उतना ही महत्त्व रखता है, जितना बेटे का। लेकिन हर सम्भव कोशिशों के बावजूद पिता अपनी बेटी को ज्यादा दिन तक बचा नहीं पाता। यह पीड़ा इस उपन्यास की पंक्ति-पंक्ति में बिंधी है।
वेदना से ज्यादा विश्वसनीय किसी का साथ नहीं होता, इस गाम्भीर्य के साथ कदम-कदम आगे बढ़ती यह कथा पाठक को भी एक असीम पीड़ा में छोड़ जाती है।

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