श्री जगदीशचन्द्र माथुर ने एक बार लिखा था : “ निराला ने हिन्दी-संसार को अनेक उपहार दिए। जानकीवल्लभ जी की प्रतिभा का प्रस्फुटन भी उनका एक अनमोल उपहार ही है...।”
निराला के पत्र से जिसमें महाकवि निराला द्वारा जानकीवल्लभ जी को लिखे गए 109 पत्र संकलित हैं, श्री जगदीशचन्द्र माथुर का उपरोक्त कथन भली-भाँति पुष्ट होता है। ये पत्र दस्तावेज़ हैं इस तथ्य के कि कैसे महाकवि ने “ जानकीवल्लभ जी की अविकसित प्रतिभा को ऐसा आमंत्रण दिया कि तब से ‘ बालकवि ’ की चेतना और अभिव्यंजना, जीवन की दारुण विभीषिकाओं के बावजूद, बराबर सक्रिय और सजग रही है।”
निराला के पत्र में सिर्फ महाकवि निराला के ही नहीं बल्कि जानकीवल्लभ जी के भी अन्तस की झाँकी पाठकों को मिलेगी। सच तो, इस पुस्तक में महाकवि के और आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के व्यक्तित्व के नये आयामों का उद्घाटन हुआ है।
पुस्तक के प्रारम्भ में जानकीवल्लभ जी की विस्तृत भूमिका है और प्रत्येक पत्र में अन्तर्निहित सन्दर्भों को विशद पाद-टिप्पणियों द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है, जिससे पुस्तक न केवल अनुसन्धित्सुओं के लिए बल्कि सामान्य पाठकों के लिए अतीव उपयोगी हो गई है।

