इस पुस्तक में दिल्ली के एक कल्पित रईस का चित्र उतारा गया है और उसको जैसे का तैसा (अर्थात स्वाभाविक) दिखाने के लिए संस्कृत अथवा फारसी-अरबी के कठिन शब्दों की बनाई हुई भाषा के बदले दिल्ली के रहने वालों की साधारण बोलचाल पर ज्यादा दृष्टि रखी गई है।
अलबत्ता जहाँ कुछ विद्याविषय आ गया है वहाँ विवश होकर कुछ-कुछ शब्द संस्कृत आदि के लेने पड़े हैं परन्तु जिनको ऐसी बातों के समझने में कुछ झमेला मालूम हुआ उनकी सुगमता के लिये ऐसे प्रकरणों पर ऐसा + चिन्ह लगा दिया गया है जिससे उन प्रकरणों को छोड़कर हरेक मनुष्य सिलसिलेवार वृतान्त पढ़ सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक में संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी की कविता का तर्जुमा अपनी भाषा के छन्दों में हुआ है परन्तु छन्दों के नियम और दूसरे देशों का चाल चलन जुदा होने की कठिनाई से पूरा तर्जुमा करने के बदले कहीं-कहीं भावार्थ ले लिया गया है।
अब इस पुस्तक के गुण दोषों पर विशेष विचार करने का काम बुद्धिमानों की बुद्धि पर छोड़कर मैं केवल इतनी बात निवेदन करना चाहता हूँ कि कृपा कर के कोई महाशय पूरी पुस्तक बांचे बिना अपना विचार प्रकट करने की जल्दी न करें और जो सज्जन इस विषय में अपना विचार प्रकट करें वह कृपाकर के उसकी एक नकल मेरे पास भी भेज दें।
यदि कोई अखबार बाला उस अंक की कीमत चाहेगा तो वह तत्काल उसके पास भेज दी जायगी) जो सज्जन तरफदारी (पक्षपात) छोड़कर इस विषय में स्वतंत्रता से अपना विचार प्रकट करेंगे मैं उनका बहुत उपकार मानूँगा।
इस पुस्तक के रचने में मुझको महाभारतादि संस्कृत, गुलिस्तां वगैरे फारसी, स्पेक्टेटर, लार्ड बेकन, गोल्ड स्मिथ, विलियम कूपर आदि के पुराने लेखों और स्त्रीबोध आदि के वर्तमान रिसालों से बड़ी सहायता मिली है। इसलिये इन सबका मैं बहुत उपकार मानता हूँ और दीनदयाल परमेश्वर की कृपा का सच्चे मन से अमित उपकार मानकर यह लेख समाप्त करता हूँ।
श्रीनिवासदास, दिल्ली

