‘पत्रकारिता का युगधर्म’ पुस्तक में हिन्दी-पत्रकारिता से जुड़े 41 लेख हैं। प्रभाष जोशी ने विभिन्न विषयों पर असंख्य लेख लिखे। उनके नियमित साप्ताहिक कॉलम ‘कागद कारे’ ने हिन्दी-पत्रकारिता में लोकप्रियता का मानक गढ़ा। उनका हर लेख खूब पढ़ा गया। इस पुस्तक में शामिल उनके लेखों में अपनी भाषा पर गर्व करने से लेकर पत्रकारिता की मर्यादा बचाए रखने तक के अनुरोध भी किये गए हैं। ‘सावधान, पुलिया संकीर्ण है’ लेख में उन्होंने अंग्रेजी की नकल करके हिन्दी को लाचार और आम बोलचाल की भाषा से दूर करने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए हैं। ‘अपने लोगों के होने का बल’ लेख में उन्होंने लिखा है कि भारतीय भाषाओं के पत्रकार पाठकों से अपने संवाद और सम्बन्ध को अपनी ताकत मानकर नहीं चलते हैं इसीलिए वे अंग्रेजी की छाया में रहते हैं। ‘एक दिन प्रेस का हो या न हो’ में उन्होंने लिखा है कि अखबारों में इसकी चेतना ही नहीं है कि एक दिन प्रेस दिवस भी होता है। कोई मंच ऐसा नहीं है जो बाजार में प्रेस की भूमिका तय करे। जीवन के आखिरी सालों में प्रभाष जी ने पेड न्यूज के खिलाफ खूब बोला और जमकर लिखा। पत्रकारों को भ्रष्ट करने के प्रयासों पर उनका चर्चित लेख ‘मूरख जनम गमायो’ भी इस संग्रह में शामिल है।
इन लेखों में एक पूरा दौर, उस दौर के तमाम अहम मसले और उन मसलों पर प्रभाष जी की प्रभावशाली विवेचना मौजूद है। वस्तुत: यह पुस्तक एक प्रतिनिधि पत्रकार का अपने समय से ऐसी बेलाग जिरह है जो आज भी अत्यन्त पठनीय और प्रासंगिक है।
एक संग्रहणीय पुस्तक!


