काफ़्का की हस्तलिपि में अपने पिता को लिखा उनका यह पत्र कुछ वर्ष पूर्व तक लापता माना जा रहा था और हाल ही के वर्षों में मिला है। पाठक जानते ही हैं कि काफ़्का मृत्यु से पहले अपनी सभी रचनाएँ अपने मित्र मार्क्स ब्रोड के पास इस निर्देश के साथ छोड़ गए थे कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हें जला दिया जाए। लेकिन ब्रोड ने ऐसा नहीं किया और एक के बाद एक उन पांडुलिपियों को सम्पादित कर प्रकाशित करवा दिया।
इस ऐतिहासिक पत्र के अस्तित्व के बारे में ख़ुद ब्रोड को भी जानकारी नहीं थी। सन् 1953 में जब यह पत्र अपने अपूर्ण रूप में पहली बार प्रकाशित हुआ तो इसके प्राक्कथन में ब्रोड ने लिखा कि काफ़्का ने यह पत्र मूल रूप से टाइपिंग मशीन पर ही टाइप किया था और बाद में हाथ से ग़लतियाँ सुधारी थीं। टाइप किए हुए साढ़े चौवालीस पृष्ठों वाले पत्र में काफ़्का ने बाद में हाथ से लिखे दो पृष्ठ और जोड़े थे—ऐसा ब्रोड का मानना था।
काफ़्का बीसवीं सदी के सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक प्रतिभाओं में एक थे। जर्मन भाषा के साथ विश्व के साहित्य में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। पिता को लिखा गया यह पत्र काफ़्का के भीतर के व्यक्ति को भी सामने लाता है।

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