प्रीत लिखूँगी प्यार लिखूँगी अंतर्मन के कैनवस पर भावनाओं की तुलिका से उकेरी गई स्नेहिल कृति है। इसमें अनुराग का समर्पण भी है, इंतज़ार का दर्द भी और आत्मीयता का वह सुखद अहसास भी, जो जीवन को अर्थ देता है। इसमें जीवन के सभी उतार चढ़ाव हैं। बचपन, युवावस्था और जीवन की सांध्य बेला है। प्रेम है, मनुहार है स्नेह, समर्पण, अनुराग, वात्सल्य सभी कुछ है। इसकी हर कविता अपने-आप में बहुत कुछ कहती है।
'लाजवंती के पात-पात का, नजरें झुकाकर इतराना उंगलियों की छुवन मात्र से, उसका यूं लजा जाना हर टहनी और पत्ते का स्नेहिल संसार लिखूंगी स्निग्ध, सुकोमल जज़्बात लिखूँगी.'....

