वैष्णव काव्य में जो आस्वाद्य है वह नीति, धर्म, दर्शन एवं पौराणिकताओं से भिन्न है। यह आस्वाद्य रचना का धर्म है और पाठक की तृप्ति का फल! यह आस्वाद्य तत्त्व इन कृतियों में नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता; यह नीति, धर्म दर्शन एवं पौराणिकताओं का धर्म है, यह भी नहीं कहा जा सकता; यह ब्रह्म के विग्रह आनन्द का ही अपर पर्याय है, ऐसा भी नहीं है, यह अनिर्वचनीय भी नहीं है, वैष्णव भक्तिकाव्य परम्परा की सशक्त कृति मानस का यह सृजन पक्ष अनेक रूपों में उजागर हुआ है। इस ग्रंथ में इस बात की बराबर चिन्ता मिलती है कि रचना के इस आस्वाद्य धर्म का एहसास कैसे कराया जाए।

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