जब पत्रकारिता का अधिकांश, पूरी तरह से चाटुकारिता में तब्दील हो गया हो, किसी पत्रकार का असल पत्रकार रह जाना एक बड़ी बात है। केवल पत्रकारों को क्या कहा जाए, दृश्य तो यह कह रहा है कि किसी नागरिक का ही असल नागरिक रह जाना बहुत कठिन बात हो गई है। ऐसे में यह गनीमत है कि हमारे पास अनिल यादव के रूप में एक ऐसा मानुस है जिसके भीतर, इस समय में भी उसका नागरिक और पत्रकार अपने असल रूप में जीवित है। आज हिन्दी का पाठक देश, दुनिया, समाज में घट रही घटनाओं पर एक ठीक-ठाक नज़रिये की चाहत लिये अख़बार, पत्रिकाएँ, फ़ेसबुक और टीवी चैनल घूरते हुए भारी हताशा का शिकार है—लगभग भेड़ बनने को अभिशप्त। ऐसे में जब अनिल यादव के लिखे से उसकी भेंट होती है तो सहसा उसकी नाउम्मीदी और ऊब से भरी आँखों में चमक आ जाती है। एक ऐसी चमक जो भुलाए जा रहे विवेक, साहस और ईमानदारी को देखने से पैदा होती है और एक बेहद ज़िन्दा अनूठी भाषा के सहारे हमारे भीतर उतरती है। यह चमक पाठक को चमत्कृत नहीं करती, बल्कि उसके भीतर भी नए चिन्तन, नई दृष्टि की चमक पैदा करती है। यह किताब ‘सोनम गुप्ता बेवफ़ा नहीं है’, अपने भीतर इसी अनिलियन एलीमेंट को पूरेपन में समेटे हुए है। यह ऐसे समय में आ रही है, जब तमाम सोनू और सोनमें रोज़ देशद्रोही और बेवफ़ा करार दिये जा रहे हैं। इस किताब में 1990 से लेकर 2016 के बीच छपी लेखक की उन चुनिन्दा टिप्पणियों को स्थान दिया गया है, जिनमें न केवल इस दौर के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का एक नए नज़रिये से विश्लेषण मौजूद है, बल्कि जो हमें आगामी परिवर्तनों को सही नज़रिये से देखे-जाने की सलाहियत भी देती है।
—सुशील सुमन

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