हिन्दी में संस्मरण/यात्रा-वृत्तान्त कम ही लिखे जाते हैं। यात्रा वृत्तान्त भी संस्मरण ही होता है। ‘सूटकेस-में-ज़िन्दगी’ विभिन्न स्थानों की यात्राओं का स्मरण है, जो हिन्दी साहित्य के लिए एक मौलिक वस्तु है।
‘सूटकेस-में-ज़िन्दगी’ संस्मरण के साथ ही लेखन की जिन्दगी का एक दस्तावेज भी है, जिस नाते यदि आप चाहें तो इसे आत्मकथा भी कह सकते हैं। मानव जीवन की आयु एक दिन मानते हुए उस दिन को टुकड़ों में बाँटकर इस ‘सूटकेस’ में भर दिया गया है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘सूटकेस’ खुलने पर जो चित्र, जो अनुभूतियाँ, जो जीवन सामने आता है, वह लेखक का नहीं पूरे उत्तर भारत का जीवन है। उत्तर भारत कभी ‘सूटकेस’ में बन्द नहीं रहा। लेकिन आजादी के बाद आदमी ‘सूटकेस’ में पैवस्त होने पर मजबूर हो गया। इस नाते ‘सूटकेस’ एक बड़े भू-भाग के बाशिन्दों की बदलती प्रकृति का प्रतीक है जिसे लेखक ने पूरी क्षमता से रेखांकित किया है। ‘सूटकेस’ उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों पर बिखरी संस्कृति, जातीय पहचान आमजन के राग-विराग बदलते परिवेश में नये-पुराने के मध्य संघर्ष का आईना है।
‘सूटकेस’ एक प्रतीक भी है, आदमी के साइज का। कुछ लोगों का ‘सूटकेस’ छोटा होता है, कुछ का बड़ा। लेकिन है सबका जीवन एक अदद सूटकेस में बन्द जो अपने-अपने साइज के भीतर गति करता है। भारत विविध धर्मों, भाषाओं, रीति-रिवाजों, भूखण्डों के बीच बिखरा पड़ा है। ‘सूटकेस’ में औसत आदमी की जिन्दगी ही नहीं, इस देश के जीवन के चित्र भी मिलेंगे। और सबसे बड़ी बात यह संदेश है कि सारी मुश्किलात के बावजूद आदमी की परिस्थितियों से मुठभेड़ करने का संकल्प कहीं क्षीण नहीं होता, जो भवसागर में सुख के क्षणों को खोज निकालता है। मौत के पुजारियों का आवाहन है कि ‘सूटकेस’ में झाँकर देखें कि कैसे मौत के बीच से जीवन चुना जाता है।


