‘राग दरबारी’ जैसी कालजयी कथाकृति के लेखक श्रीलाल शुक्ल का यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास एक शिक्षित और प्रतिभाशाली ग्रामीण युवक के टूटते सपनों और फिर उसके द्वारा एक रचनात्मक भूमिका के स्वीकार की मार्मिक कथा है। रामदास नाम के इस युवक ने अपने पिता को कर्जदार होकर अपने ही एक ‘खानदानी’ ठाकुर के घर बंधुआ-जैसी जिंदगी जीते देखा है, उनकी मृत्यु के बाद हेडमास्साब के पास अनाथ की तरह रहते हुए ट्यूशन कर अपनी पढ़ाई पूरी की है–एक मेधावी छात्र के रूप में प्रथम श्रेणी में डिग्रियाँ हासिल की हैं। लेकिन उसके पास कोई सिफारिश नहीं, अवसर पाकर भी वह किसी बड़े आदमी का दामाद नहीं, इसलिए उसका कोई भविष्य नहीं। न वह लेक्चरर बन सकेगा, न संपादक। वह स्वयं को ऐसे समाज में पाता है जहाँ उसकी सोच, प्रतिभा और आदर्श के ‘व्यापारी’ प्रतिष्ठित हैं। फलस्वरूप युग के आकर्षण, अतीत की प्रताड़ना और वर्तमान की निराशा को झाड़कर वह उसी अँधेरी और सुनसान घाटी में उतरने का फैसला करता है, जहाँ उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। और इस समूची यात्रा में सत्या–एक पवित्र आस्था की तरह उसके साथ है।

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