प्रस्तुत कृति में आगमिक चिन्तन के आलोक में सूर-साहित्य को देखने-परखने का प्रयास किया गया है। ‘स्वच्छन्द तन्त्र’ के अनुसार पराशक्ति का ही नाम आगम है। वैदिक धारा में राग की सत्ता अंग रूप में ही है। अंगीरूप में नहीं। परन्तु अगम धारा में चंचल चित्त वालों के अनुरूप राग - तत्त्व को अंगीरूप में स्थापित किया गया है। विद्वान् लेखक ने गम्भीर चिन्तन, मनन और अध्ययन के बाद इस ग्रन्थ का नयी दृष्टि के प्रणयन किया है। इस प्रकार यह पुस्तक ज्ञानवर्द्धक के साथ - साथ विचारोत्तेजक भी है और सूर-साहित्य की सर्वथा नवीन व्याख्या देने की प्रेरणा प्रदान करती है। इसलिए इस विषय के प्रेमियों के लिए नितान्त उपादेय है।
विश्वास है कि सूर-साहित्य के विद्यार्थी भी इससे लाभान्वित होते रहेंगे।

