‘सूरज सबका है’ ऐतिहासिक कृति से अधिक लोक-मानस की कृति है। कथा की शुरुआत 1804-15 में गोरख्याणी-गढ़वाल पर गोरखों के आक्रमण से होती है जो बीच-बीच में क्लेश की तरह सोनी गाँव की दादी की जिवेषणा, गढ़वाल की तत्कालीन राजधानी श्रीनगर में रानी कर्णावती के साहस, बुद्धि-चातुर्य, दिल्ली की मुग़ल सल्तनत के मनसबदार नजावत खाँ की मूर्खतापूर्ण लोलुपता, ईस्ट इंडिया कम्पनी की धूर्तता से गुज़रते हुए, आज़ाद भारत के शुरुआती दिनों में परगनाधिकारी देवीदत्त की सहृदयता को लक्षित करते हुए सोनी गाँव पर ही समाप्त हो जाती है। औपन्यासिक भाषिक संरचना की दृष्टि से विद्यासागर नौटियाल का समूचा कथा-संसार, विशेषकर ‘सूरज सबका है’ अद्वितीय, अप्रतिम है।
—मुहम्मद हम्माद फ़ारूक़ी

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