हिन्दी उपन्यास में स्वातन्त्र्योत्तर युग में आयी एक नई प्रवृत्ति विदेशी परिवेश और जीवन-मूल्यों का विश्लेषण है। हिन्दी के कई उपन्यासों में विदेशी जीवन के तौर-तरीके चित्रित हैं।
पश्चिमी संस्कृति और जीवनक्रम से जुड़े आयातित जीवन-मूल्यों को हिन्दी उपन्यासों में चित्रित करने की जो प्रवृत्ति स्वातन्त्र्योत्तर युग में हुई है, उसका दिग्दर्शन करने वाला अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है। भारतीय सन्दर्भ में इन आयातित जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता और उपादेयता पर दृष्टिपात करने की सख्त आवश्यकता है।
इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति और चिन्तन के मौलिक स्वरूप, स्वतन्त्र्योत्तर युग के उपन्यासों की विशेष रूप से प्रभावित करने वाली चिन्तन-धाराओं, हिन्दी उपन्यास की बदलती धारणाओं और धाराओं, स्वतन्त्र्योत्तर युग में प्रणीत हिन्दी उपन्यासों में चित्रित विदेशी परिवेश और जीवन-मूल्यों का अध्ययन, मार्क्सवादी चिन्तनधारा से प्रभावित उपन्यासों की चर्चा, मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों से प्रभावित स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी उपन्यासों का विश्लेषण, अस्तित्ववादी दर्शन के प्रभाव पर विचार-विमर्श, विभिन्न वादों से अलग रहकर परिवर्तित जीवन-मूल्यों को चित्रित करने वाले उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस कृति में हिन्दी उपन्यास की विकास यात्रा में क्रम और क्रमहीनता देखी जा सकती है। युग सन्दर्भ, जीवन की परिस्थितियाँ, अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर होने वाले वैचारिक और बौद्धिक परिवर्तन इन सबसे कभी जुड़कर और कभी कटकर हमारा उपन्यास साहित्य आगे बढ़ता रहा है। वह विकास यात्रा आज भी जारी है।

