गोविन्द पुरुषोत्तम देशपाण्डे आधुनिक मराठी नाट्य-जगत के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। ‘उद्ध्वस्त धर्मशाला तथा अन्य नाटक’ पुस्तक में उनके तीन बहुचर्चित नाटकों को रखा गया है—उद्ध्वस्त धर्मशाला, मामका : पाण्डवाश्चैव तथा एक बज चुका है। मराठी रंगमंच को इन नाटकों ने दूर तक प्रभावित किया है और इनका हिन्दी रूपान्तरण रंगकर्म से जुड़े तीन सुपरिचित रचनाकारों के द्वारा किया गया है।
कथ्य और शिल्प की दृष्टि से ये तीनों ही नाटक भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग (जिसमें रंगकर्मी भी शामिल हैं) के वैचारिक धुँधलके और उसकी काल्पनिक क्रान्तिकारिता पर तीखे कटाक्ष करते हैं। आधुनिक भारतीय युवावर्ग पश्चिम के जिस भोगवादी नजरिये का शिकार है, उसने सामाजिक बदलाव की तमाम सम्भावनाओं को धूमिल कर दिया है। इस तथ्य को लेखक ने गहरी पीड़ा और संवेदना के साथ उकेरा है। उसने साहित्य, कला, संस्कृति और राजनीति—यथास्थितिवाद की शिकार वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में—इन सभी की प्रासंगिकता पर अनेक सार्थक सवाल उठाये हैं। ये नाटक निश्चय ही हिन्दी रंगमंच को एक नये अनुभव-जगत से गुजरने का अवसर प्रदान करेंगे।

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