'उद्धव-शतक' रत्नाकर जी की काव्य-यात्रा का चरम बिन्दु सिद्ध होती है और बीसवीं शती की ब्रजभाषा की एक असाधारण काव्यात्मक उपलब्धि भी। इसमें निस्संदेह रत्नाकर की काव्य-कला का उत्कृष्टतम रूप प्रकट हुआ है।
जीवन के अंतिम तीन वर्षों में भी रत्नाकर की लेखनी ने कुछ कवित्त-रत्न अवश्य रचे होंगे परंतु उन छंदों तथा कुछ पूर्व-रचित किन्तु अप्रकाशित छंदों के विषय में प्रामाणिक जानकारी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। ऐसी दशा में यही कहना ठीक लगता है कि 'उद्धव-शतक' लिखने में रत्नाकर जी ने अपनी कलम तोड़ दी। सूर ने जो दिशा-निर्देश किया था वह पूर्णतया अनुसरित नहीं हुआ किन्तु उद्धव हठयोग और ज्ञानमार्ग एवं शांकर अद्वैतवाद के प्रतीक बन गये। वैष्णव-भक्ति का केवल कबीर आदि ने खण्डन नहीं किया वरन वैष्णवाचार्यों के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए शांकर मत ने भी खण्डित किया जिसका परिणाम यह हुआ कि गोपी-उद्धव-संवाद केवल निर्गुण-सगुण का द्वन्द्व नहीं रहा वरन् उसमें मायावाद का निषेध भी उतने ही महत्त्व के साथ सम्मिलित हो गया। यह संवाद मुक्तक और प्रबन्धात्मक दोनों रूपों में मिलता है। रत्नाकर के 'उद्धव-शतक' में यह दोनों रूप एक साथ समाहित है। मुक्तक रूप होते हुए भी उसमें कथावस्तु को प्रबन्ध के साथ प्रस्तुत किया गया है।

