‘ये कोहरे मेरे हैं’ में संकलित भवानी भाई की, 1954-55 से लेकर 1970-71 की डायरियों में लिखी, वे प्रेम-कविताएँ हैं, जो पहली बार यहाँ एक साथ प्रकाशित हो रही हैं। ये ठेठ प्रेम-कविताएँ हैं और कवि ने इनके माध्यम से अपने जीवनानुभवों और काव्य-बोध को निरन्तर विकसित, विस्तृत और सुसम्पन्न किया है। मानव-स्वभाव की सरलता और जटिलता, रंगीनी और सादगी का जैसा जोड़-तोड़ यहाँ प्रतिफलित है, उससे यह भी सूचित होता है कि भावों के सुसंस्कार में विचारों की भूमिका किस कोटि का योगदान करती है और कविता कैसे-कैसे झड़े-तिरछे रास्तों और उतार-चढ़ावों से होकर अपना साज-सँवार पाती है।
निश्चय ही इन कविताओं में कवि ने अपने व्यक्तित्व के उस पक्ष को दर्ज किया है, जो न तो स्वतंत्रताप्रेमी आन्दोलनकारी का है, न ही जोशो-खरोश से लबालब भरे आदर्शवादी का। इनमें मानवीय रिश्तों का एक ख़ूबसूरत सपना देखने की कोशिश है जो किसी भी श्रेष्ठ कविता से सहज अपेक्षित है। कहने को ये सपने बहुत आमफहम और मामूली हैं, किन्तु वास्तविक जीवन में इनकी परिणति इन दिनों लगभग असम्भव हो उठी है। इनमें एक आदमी का दूसरे आदमी के पास तनिक देर बैठकर अपना दु:ख-दर्द कह डालने की इच्छा, परस्पर के नेह-बन्धन में बँधकर आकाश-भर विस्तार पाने की आकांक्षा, जीवन की भागम-भाग और निरन्तर मशीनी और औपचारिक होते सम्बन्धों के विरोध में सघन परिचय और आत्मीयता की बारादरी सजाने का सपना झिलमिला रहा है।

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