प्रेम संयोग का परिणाम होता है। संयोग से आरम्भ हो एक संयोग पर पूरा भी हो जाता है। आगे के लिए नहीं बचता। अंत को दुर्योग भी कह सकते हैं पर प्रेमी ऐसा नहीं कहते, व्यापारी, षड्यंत्रकारी, हासिल करके गुल्लक में रख लेने वाले योद्धा ज़रूर कह सकते हैं।
ये कविताएँ संयोगों में चलती हैं। प्रेम की यात्रा में प्रेम को और स्वयं को देखते-जानते, डूबते-उतराते, बँधते-छूटते हुए।
इसी आरोह-अवरोह में भाषा भी अपने को उलट-पलट कर दुबारा देखती है, अपने शब्दों को नई तरतीब देते हुए, उस अर्थ को ग्रहण और व्यक्त करने को व्याकुल जिसे प्रेम देता है, प्रेमी पाते हैं
और अवाक् रह जाते हैं, शब्दरहित। सौन्दर्य का अंकन उससे भी कठिन, जितना कठिन उसका भोग; पौरुष और पराक्रम जहाँ असफल होते हैं, पर चाह की कील क़लम बन उसे कुछ तो आँकती है : तिल को वह कह पाती है—
यह ‘सुंदर’ का अनुस्वार है।
अविनाश मिश्र की यह प्रेम-पुस्तिका जीवन और भाषा, दोनों जगह प्रेम को पुनर्न्यस्त करती है, लेकिन इन पंक्तियों में
उतरने के लिए पहली शर्त है—प्रेम में होना। अप्रेमियों के लिए यह नहीं है।


