लघु कथा इक्कीसवीं सदी की सर्वाधिक सशक्त स्वायत्त विधा है, जिसमें कम से कम शब्दों में देखी एवं भोगी हुयी घटनाएँ, कथाएँ तथा अनुभव संग्रहीत होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘आखर थोरे’ ५१ लघुकथाओं का संकलन है जिसमें वर्तमान समाज के प्राय: प्रत्येक पक्ष को अभिव्यक्त किया गया है। कहीं अमानुषिक व्यवहार, कहीं सामाजिक तथा राजनैतिक विसंगतियाँ तथा कहीं दीनों तथा वंचितों के प्रति करुणा तथा आक्रोश व्यक्त किया गया है। आज के टी.वी., लैपटॉप तथा मोबाइल की व्यस्ततम िंजदगी में चाहकर भी मानव भारी-भरकम, मोटी-मोटी पुस्तकें नहीं पढ़ सकता; इसलिए सर्वजन हिताय तथा सर्वजन-सुखाय छोटी-छोटी कथाओं का माहात्म बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि अर्थपूर्णता के साथ ही सुरुचिपूर्ण यह लघु-कथा संग्रह समय और समाज को समर्पित करते हुए मैं हर्षित भी हूँ और गौरवान्वित भी।

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