‘अनुभव बहते रहे अबाध’ नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर जगदीश गुप्त की उन कविताओं का संकलन है जिनकी विषयवस्तु इलाहाबाद और इलाहाबाद की साहित्यिक संस्कृति से जुड़ी है। कह सकते हैं कि साहित्यिक रूप से अत्यन्त गतिमान तत्कालीन इलाहाबाद यहाँ मूर्त हो उठा है।
इन कविताओं में गंगा भी है, उसकी उठती-गिरती लहरें भी हैं, और वह समय भी है जब विश्वविद्यालय परिसर की गतिविधियाँ, वहाँ की बहसें न केवल उस शहर, बल्कि हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा को भी दिशा देती थीं।
अपनी कविता और अपनी दैनिकता में भी जगदीश गुप्त इलाहाबाद को जीते थे। यहाँ की रचनात्मक ऊर्जा ही उनकी रचनात्मकता में कैसे परिणत होती थी, इस संग्रह की कविताएँ उस रूपान्तरण की साक्षी हैं।
यहाँ संकलित कविताओं से पाठक निराला, पन्त, महादेवी, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, अश्क-दम्पती, रामविलास शर्मा, रवींद्र कालिया और ममता कालिया दम्पती व्यक्तित्वों को एक अलग रूप में देख पाएँगे। इसके अलावा इस संग्रह में शामिल ‘इलाहाबाद की कहानी कहता नीम का पेड़’, ‘हिन्दी विभाग में वार्षिकोत्सव’, ‘वसंत पंचमी और निराला’, ‘पंत जी और परिमल’, ‘परिमल में बिखराव’ और ‘नवान्न का स्वागत’ जैसी कविताएँ उस समय के रचनात्मक वातावरण को भी आज के पाठक के सामने साकार कर देती हैं।
हिन्दी की नई कविता का एक भिन्न रूप और आस्वाद इन कविताओं में दिखाई पड़ता है।

