वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ के जनकवि नागार्जुन बनने की यात्रा में जिन चन्द लोगों ने अपना जीवन होम किया, उनमें उनकी अर्द्धांगिनी अपराजिता का स्थान सबसे ऊपर है। ‘अपराजिता’ उनके इसी अनदेखे-अमूल्य योगदान का मार्मिक उद्घाटन है।
यह एक साधारण स्त्री के असाधारण जीवन-प्रवाह की कथा है। लगभग निरक्षर, कम उम्र में विवाहित और परिवारिक ज़िम्मेदारियों से बँधी अपराजिता का जीवन निस्सन्देह ग्रामीण भारत की अधिकतर स्त्रियों की तरह निपट साधारण रहा। एक विचार-समृद्ध बड़े रचनाकार की पत्नी होने के बावजूद उनमें किंचित कोई बदलाव नहीं आया। लेकिन जिस जीवट, धैर्य और अदम्य साहस के साथ उन्होंने अपना समूचा जीवन जिया, वह न सिर्फ़ उनके नाम को व्यापक अर्थों में सार्थक करता है बल्कि उसके व्यक्तित्व के असाधारण पक्ष को भी सामने ला देता है।
इस जीवनी से गुज़रते हुए यह सहज ही महसूस होता है कि अपराजिता का फलक केवल नागार्जुन की जीवनसंगिनी होने तक सीमित नहीं रहा। वह आजीवन उस ‘यात्री’ की सहयात्री बनी रहीं, जिसके लिए यायावरी ही जीवन था। लेकिन उनके भी अपने सपने थे, उन सपनों के अधूरे रह जाने की टीस थी, पढ़ने-लिखने की गहरी उत्कंठा थी, और थी अपने स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान पाने की मौन आकांक्षा। शायद यही कारण है कि ‘अन्तिम प्रणाम’ लिखने वाले नागार्जुन अपराजिता के ‘सिन्दूर तिलकित भाल’ को नहीं भूल सके और उनकी देहरी पर वापस लौट आए।
एक अवश्य पठनीय कृति, एक अनिवार्यतः संग्रहणीय पुस्तक!


