नलिन जी कहानी को 'शोधना' समझते थे। उनके मुताबिक कहानीकार बिन्दु में केन्द्रित विराट और पूर्ण सत्य का उद्घाटन करता है। कहानीकारों के दो काम होते हैं-बिन्दु फैले नहीं और बिन्दु पर से निगाह विचले नहीं। पिंड में ब्रह्मांड का सत्य देख लेना कृच्छ्र-साधना है, यह संत ही नहीं कहानीकार भी जानते हैं।' यही उनके कहानीकार की आधार-भूमि थी। जितने समय में कुछ लोगों ने उपन्यास पूरे कर लिए उतना समय उन्होंने एक-एक कहानी को दिया। उनका कहानी-लेखन ढाई दशकों में फैला है। इस दौरान कई कहानी आन्दोलन चले लेकिन उन्होंने खुद को उनसे अलग रखा। उनकी कहानियों में सामाजिक समस्याएँ, मनुष्य की मनोग्रन्थियाँ, यौन मनोविज्ञान और प्रेम जैसे विषय प्रमुख हैं।
उनकी पहली कहानी 'नारी की त्रिविधा' सन् 1937 ई. में कलकत्ते के साप्ताहिक' विश्वमित्र' में प्रकाशित हुई थी। लेखन-काल की दृष्टि से देखें तो उनका कहानी-लेखन ढाई दशकों का है। इस दरमियान कई कहानी-आन्दोलन चले, उन आन्दोलनों से उन्होंने अपने को अलग रखा। हालाँकि उनकी प्रसिद्ध प्रेम-कहानी 'बरसाने की राधा' का प्रकाशन 'नई कहानियाँ' के प्रवेशांक में हुआ था।
उनकी कहानियों में सामाजिक समस्याएँ, मनुष्य की मनोग्रन्थि, यौन मनोविज्ञान और प्रेम जैसे विषय प्रमुख हैं। संग्रह में शामिल' लल्लू की आजादी' उनकी प्रसिद्ध सामाजिक कहानियों में शामिल है। कथ्य और शिल्प, दोनों दृष्टियों से यह एक कालजयी कहानी है। स्त्री-मनोग्रन्थि को चित्रित करनेवाली कहानियों में' फूल का बदला', 'अजया', 'काले सपने', 'जैगुअर' और 'रोने की कला' प्रमुख हैं। इस संग्रह में शामिल 'किरण: धीरेन की ममी' धीरेन सीरीज की कहानी है। इन कहानियों का नायक धीरेन है। दरअसल, वे एक प्रयोगवादी उपन्यास लिख रहे थे। उनकी योजना यह थी कि पाठक अगर अलग-अलग पढ़े तो उसे कहानी का आस्वाद मिले और पूरा पढ़ने पर उपन्यास का। उनके इस प्रयोग को आज भी याद किया जाता है।


