भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों की ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ विश्वविख्यात है, पर महाभारत में एक और दुर्लभ गीता है, जिसे ‘ब्राह्मणगीता’ कहा जाता है। यह गीता कोई साधारण गीता नहीं है अपितु श्रीकृष्ण की स्मृति-संजीवनी है; विस्मृति पर विजय का दिव्य उपदेश है। यह एक ऐसा दिव्य-दुर्लभ उपदेश है जो युद्धोत्तर मौन में जन्मा था लेकिन आज के चंचल मन के लिए उतना ही प्रासंगिक है। महाभारत युद्ध के बाद जब अर्जुन ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का समूचा ज्ञान भूल गए तब श्रीकृष्ण ने नए रूप में, शान्त और विवेचनात्मक शैली में उनको स्मृति के पुनर्जागरण का यह ज्ञान दिया था। यह ग्रन्थ स्मृति और विस्मृति के उस मानवीय संकट को समझाता है, जिसे आधुनिक विज्ञान अल्पकालिक स्मृति-हानि कहता है। इसका सन्देश बहुत स्पष्ट है कि ज्ञान यदि साधना यानी अभ्यास से न जुड़े तो वह क्षीण हो जाता है। इसे पहली बार नए युग के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। यह ग्रन्थ केवल पढ़ने के लिए नहीं है बल्कि समझ कर याद रखने और जीवन में उतारने के लिए है।

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