‘देवराज इन्द्र’ सर्वश्रुत पौराणिक देवता पर केन्द्रित उपन्यास है।
इन्द्र किंचित अकेले ऐसे देवता हैं जिनके बारे में हमारा पौराणिक वाङ्मय एक साथ दो विपरीत विशिष्टताओं का उल्लेख करता है। एक तरफ़ वेदों में उनकी प्रशंसा की गई है तो दूसरी तरफ़ अनेक बार ऋषियों ने उन्हें शाप दिया है। एक तरफ़ वे देवताओं के राजा और पराक्रमी योद्धा हैं तो दूसरी तरफ़ अपना सिंहासन छिन जाने के भय से निरन्तर आक्रान्त और असुरों से बारम्बार पराजित भगोड़ा। काम-लोलुपता उनके चरित्र का एक और बड़ा दोष है। ऐसे इन्द्र की बहुवर्णी कथा का कथाकार महेंद्र मधुकर ने इस उपन्यास में ऐसा पुनराविष्कार किया है जो न सिर्फ रोचक है बल्कि भारतीयता के उदात्त सांस्कृतिक बोध को भी अभिव्यक्त करता है।
यह उपन्यास बतलाता है कि इन्द्र के आदेश से बँधी स्त्रियों के बीच से उठा विद्रोह अन्ततः देवराज के हृदय को परिवर्तित करने में सफल होता है। एक परम्परा के वाहक के रूप में उन्हें समय के अनुरूप संशोधन और परिवर्तन को स्वीकार करना पड़ता है। वस्तुतः उपन्यास यह सन्देश देता है कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए अपनी महत्ता से परिचित होना आवश्यक है और परम्परा की निरन्तरता सिर्फ उसके अनुपालन में नहीं बल्कि उसमें समयानुकूल संशोधन करने, उसको संस्कार देने में है।
एक अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय कृति!


