राम रावण तो मन के ही अभिरूप हैं
दोनों सोते हुए मन के ही रूप हैं
यदि जगाओगे रावण तो कोहराम है
राम को यदि जगाओ तो अभिराम है
कविवर योगेन्द्र नाथ द्विवेदी की कविताओं का यह संकलन ‘एक दीपक सब जलाएँ’ राष्ट्रप्रेम, ईश-श्रद्धा, जीवन, समाज और परिवार के भावों से उपजी सरस कविताओं की एक छन्दबद्ध प्रस्तुति है।
ये कविताएँ भारत के सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन की पहचान विभिन्न त्योहारों की सकारात्मक चेतना को तो शब्द देती ही हैं, विभिन्न ऋतुओं की प्राकृतिक छटाओं और राष्ट्र की स्मृति में बसे सुभाष चन्द्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानी और नीरज जैसे लोकप्रिय कवि को भी भावांजलि देती हैं। कई कविताएँ कृष्ण जन्माष्टमी, रक्षाबन्धन और ईद आदि पर्वों का भी जीवन्त वर्णन करती हैं।
प्रेम, मनुष्यता, कर्म और विश्व-व्यापी मानव-भाव को रेखांकित करने वाली इन कविताओं का लक्ष्य समाज में ऐसी भावनाओं का संवर्द्धन करना है, जिनसे अखिल विश्व का भविष्य उजला हो :
एक दीपक सब जलाएँ, आदमी के प्यार का
एक दीपक सब जलाएँ, एकता के भाव का
एक दीपक सब जलाएँ, आपसी सद्भाव का
ये कविताएँ निश्चय ही पाठक के भीतर के कल्याण-भाव को जाग्रत करेंगी।


