वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की डायरी-टीपों, छोटी-बड़ी टिप्पणियों, समकालीन रचनाधर्मिता की दशा-दिशा पर उनके चिन्तन और कविता की केमिस्ट्री से लेकर समकालीन कवियों और कविताओं पर उनकी अन्तर्दृष्टिपूर्ण अभिव्यक्तियों से समृद्ध यह पुस्तक हमें जहाँ उनके विचार-जगत की व्यापकता का पता देती है, वहीं हमारे समय की दुविधाओं के साथ-साथ उसके रचनात्मक पहलुओं को भी प्रकाशित करती है। <br><br>
कवि की यह तीसरी नोटबुक आरम्भ होती है कविता की सत्ता के विवेचन से और फिर निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, फ़ैज़, साहिर, अज्ञेय, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे और वीरेन डंगवाल के काव्यात्म में झाँकते हुए प्रसाद की नाट्य-कला तक पहुँचती है। <br><br>
बीच-बीच में कुछ संक्षिप्त टीपें भी इसका हिस्सा बनती हैं जो हमें वस्तुओं के विज्ञापन और किताबों की समीक्षा में क्या फ़र्क़ है, और इस तरह के अन्य अनेक प्रश्नों पर सोचने की प्रेरणा देती हैं, और साथ ही कई दिलचस्प पंक्तियाँ भी— <br><br>
हिन्दी में अकादमिक आलोचना के प्रति एक नकार का भाव बना हुआ है और शायद इसीलिए अकादमिक आलोचना में ऐसे लोगों की भरमार है जिनकी ऊपर की मंज़िल पूरी तरह से ख़ाली है, उसमें वे किसी किराएदार को आने नहीं देते और ख़ुद कभी झाड़ू नहीं लगाते।


