चतुरशीतिलक्षेश्च व्याप्तं हि भुवनत्रयम्।
एकात्मा सर्वदेहेषु प्रकृतेर्भिन्तता कथम्॥
चौरासी लाख योनियों में उत्पत्ति पाए जीवों से तीनों लोक ही व्याप्त हैं। इन सभी जीवों के शरीरों में जब एक ही आत्मतत्त्व आश्रय करता है तो इनके स्वभावों में परस्पर भिन्नता क्यों कर दीखती है?


