गुरु गोविन्दसिंह ने आनन्दपुर साहिब में दस वर्ष रहने के बाद तीन वर्ष पाऊँटा साहिब में बिताए और पुन: जीवन के अगले अठारह वर्ष फिर आनन्दपुर साहिब में बी बिताए, जब तक कि कभी कभी लड़ाईयों से तंग आकर और उन्हें आनन्दपुर साहिब नहीं छोड़ना पड़ा।
भंगाणी के युद्ध के बाद कई किले बनवाकर उन्होंने अपने राजनैतिक कौशल का परिचय दिया। सं. १७४६ में उन्होंने जीवन के ४-५ वर्ष शांति में बिताए। इसी समय में उन्होंने रामायण, महाभारत के वीरों, हनुमान तथा चण्डी के वीरतापूर्ण कार्यों का अध्ययन कर अपने योद्धाओं को अदम्य साहस की प्रेरणा प्रदान की। उनके जीवन में जो हिन्दुत्व ओत-प्रोत था उसी से अनुप्राणित होकर संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्होंने ५ ब्राह्मणों को काशी भेजा था।
-इसी पुस्तक से
गुरु गोविन्दसिंह का सारा साहित्य भाव विचार, कल्पना, शैली, भाषा, अलंकार, छन्द-विधान, रस आदि सभी दृष्टियों से भारतीय संस्कृति के परम्परीय साहित्य का ऐसा सशक्त एवं अविभाज्य अंग है, कि उसे उससे अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। वेदों एवं उपनिषदों का ज्ञान, पुराणों का आलोड़न-विलोड़न, स्मृतियों के नियम, गीता का संदेश, भारतीय इतिहास के आख्यान, समाज के मूल्य, ऐतिहासिक, पौराणिक एवं परम्परागत व्यक्तियों के जीवन और चरित्र, दर्शन ग्रंथों का सार, उत्कृष्ट ऋषि-मुनियों का आचार, कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति के सभी तत्त्वों को उन्होंने अपने कृतित्व और उससे बढ़कर अपने कृतित्व और उससे बढ़कर अपने जीवन के माध्यम से साकार किया है। संक्षेपत: यह कहा जा सकता है कि गुरु गोविन्द सिंह का सम्पूर्ण साहित्य भारतीय संस्कृति की मध्ययुगीन व्याख्या प्रस्तुत करता है। यही उनके साहित्य का गौरव चिन्ह है।

