परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों में एक स्वरूप ‘हंस’ भी है जिसका उल्लेख महाभारत और श्रीमद्भागवत में भी आया है। लेकिन महर्षि वेद व्यास ने ‘श्रीमद्भागवत’ और ‘महाभारत’ के नितान्त भिन्न गीता उपदेशों में हंस स्वरुप का उल्लेख किया है। वस्तुत: ‘हंसगीता’ में वर्गित ईश्वरीय विभूति ‘हंस’ भगवान के चर्चित अवतारों का कोई छूटा अवतार नहीं है, बल्कि यह दशावतार से भी अधिक ऊंचे स्तर का दार्शनिक प्रतीक है! इस अवतार में भगवान कुछ करते नहीं हैं बल्कि ‘ज्ञान’ बन जाते हैं। वह साधक को यह समझाते हैं कि तुम जिस सत्य को खोज रहे हो, वह परम तत्त्व स्वयं तुम्ही हो! भारतीय मनीषा में इसी ‘हंस’ को विवेक का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है और सत्य और असत्य, जड़ और चेतन के मध्य सूक्ष्म भेद को जान लेना ही ‘विवेक’ है।
ज्ञानस्वरूप ‘हंसगीता’ मन की वृत्तियों को नियंत्रित करने के प्राचीन एवं प्रामाणिक सूत्रों के साथ, ‘श्रीमद्भागवत’ और ‘महाभारत’ के गीतोपदेशों को शास्त्रीय प्रमाणों और सन्दर्भों सहित समझाती है।
यह पुस्तक एक ओर जहाँ श्रीमद्भागवत की ‘हंस गीता’ में व्यक्त मन के निरोध और सांख्य योग के रहस्यों को उद्घाटित करती है, वहीं महाभारत के शांति पर्व की ‘हंस गीता’ में समझाये गए जीवन मूल्यों, क्षमा और सदाचार के व्यवहारिक पहलूओं को भी समझाती है।


