सामान्यतः तो जीवन और लेखन समानान्तर ही रहते हैं लेकिन जब प्रणयन गम्भीर कर्म और स्वत्व बन जाता है तब जीवन और लेखन तदाकृत हो जाते हैं। लेखन के सन्दर्भ में अद्वैत की यह युग्म स्थिति भले ही चिन्मयकारी लगे, लेकिन जीवन के सन्दर्भ में अनेक विषमताएँ उत्पन्न हो जाया करती हैं।
‘हम अनिकेतन’ की इस यात्रा में बहुत कुछ इसी संगमनी मानसिकता को देखा जा सकता है कि इस यात्रा में जीवन पूरी तरह परिपार्श्व, भूमि या समर्पित हो गया है और हमें आद्यन्त लेखन ही यात्रिक बना दिखता है। शायद नरेशजी के जीवन का भी यही प्रतिपाद्य था—लेखन। अतः कहा जा सकता है कि कला या प्रणयन के क्षेत्र में जीवन को ही तिरोहित या आहूत होना होता है तभी सम्भव हुआ करती है लेखकीय अद्वैतता और अद्वितीयता।


