‘‘न्यूज़रूम में हत्या, बलात्कार, घोटाले, हाशिए के समाज को लगातार धकेली जानेवाली ख़बरों—और तो और—लव, सेक्स, धोखा पर लॉयल्टी टेस्ट शो की आपाधापी के बीच भी कितना कुछ घट रहा होता है। किसी से क्रश, किसी की याद, कैम्पस में बिताए गए दिनों की नॉस्टेल्जिया, भीतर से हरहराकर आती कितनी सारी ख़बरें, लेकिन टेलीविज़न स्क्रीन के लिए ये सब किसी काम की नहीं। टेलीविज़न के लिए सिर्फ़ वो ही ख़बरें हैं जो न्यूज़रूम के बाहर से आती हैं, वो और उनकी ख़बरें नहीं जो इन सबसे जूझते हुए स्क्रीन पर अपनी हिस्सेदारी की ख़्वाहिशें रखते हैं। 'इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं' उन ख़्वाहिशों का वर्चुअल संस्करण है।’’

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