बीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में इतिहास दर्शन, साहित्येतिहास और आलोचना प्रक्रिया तथा पश्चिमी आलोचना प्रक्रिया तथा पश्चिमी आलोचनााशास्त्र के विकास क्रम में साहित्येतिहास की प्रक्रिया पर पुनर्विचार जैसी समस्याएँ प्रकाश में आईं तथा इसका प्रंभाव हिन्दी साहित्य पर भी पड़ा। फलस्वरूप डॉ. सुमन राजे, डॉ. नलिन विलोचन शर्मा, डॉ. भोलाशंकर व्यास, प्रो. हरिश्चन्द्र मिश्र, डॉ. मैनेजर पाण्डेय, डॉ. विजय शुक्ल, डॉ. देवी लाल मौर्य आदि की पुस्तकें हिन्दी साहित्य के इतिहास दर्शन एवं उसकी अन्यान्य समस्याओं से सम्बद्ध प्रकाश में आईं। यह पुस्तक भी इसी दिशा में एक प्रयास मात्र है।
साहित्येतिहास लेखन के संदर्भ में कई भ्रम हैं—जैसे पहला भ्रम, शाश्वत इतिहास दृष्टि या इतिहास ग्रन्थ की रचना का है। यह इतिहास दृष्टि के प्रति अनैतिहासिकता का भ्रम है। इतिहास दृष्टि परम्परा, साक्ष्यों की विद्यमानता से सम्बद्ध विवेक, सामयिक चिन्तन के विकास आदि के कारण निरन्तर बदलती रहती है। उसमें स्थायी तथा शाश्वत शायद कुछ भी नहीं है। अत: शाश्वत् इतिहास दृष्टि या स्थायी इतिहास ग्रन्थ जैसा कोई संदर्भ इतिहास में नहीं बनता। हजारों वर्षों की गहन अतीत की मानवीय चिन्तनधारा की पकड़ स्वयं में एक दुष्कर कार्य है, फिर भी, इतिहास लेखन की अपनी प्रक्रिया चलती रहती है।
दूसरा भ्रम साहित्य के इतिहास लेखन का है। साहित्य के इतिहास लेखन का यह प्रश्न स्वयं में विवादास्पद है। आचार्य शुक्ल के पूर्व यह इतिवृत्ति संग्रहों तक सीमित था, तब आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विरोध करते हुए कहा कि साहित्य का इतिहास इतिवृत्तों का संग्रह मात्र नहीं है। आज आलोचकों का एक वर्ग कहता है कि साहित्येतिहास लेखन स्वयं एक प्रकार की आलोचना है, इतिहास नहीं।
इस पुस्तक का मन्तव्य ऐतिहासिक जटिलताओं को इंगित करना न होकर इतिहास दर्शन, हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की विविध समस्याओं तथा लिखे गये इतिहास ग्रन्थों का पुनर्विश्लेषण है ताकि इतिहास लेखन की एक समग्र एवं स्पष्ट दृष्टि का विकास हो सके।


