शहरों को हम इधर जिस रूप में देखने-जानने लगे हैं, दरअसल वही एक तरीक़ा उन्हें देखने का नहीं है। सभ्यता और समझ के इस इकहरे मोड़ पर हम उन्हें उनकी चौड़ी-चमचमाती सड़कों, लकदक ऊँची बिल्डिंगों और ऐसे हरे पार्कों के रूप में देखना चाहते हैं जहाँ न कहीं ज़रा-सा मैलापन हो, न कोई सूखा पत्ता किसी घास के मैदान को ‘गन्दा कर रहा हो। शहरों को देखना दरअसल उनके उन हिस्सों में संभव होता है जहाँ ज़िन्दगी अपने साँवली आभा में मद्धम साँस लेती हुई भूत, भविष्य और वर्तमान का करघा चलाती रहती है, स्मृतियों को बुनती और इतिहास की दरारों को भरती रहती है।
लखनऊ भी भारत के ऐसे ही शहरों में अपनी अलग जगह रखता है जिन शहरों की गलियों में टहलते हुए आप हिन्दुस्तान की रूह से मुख़ातिब होते हैं, जान पाते हैं कि वह क्या शय है जो इस मुल्क़ की हस्ती को हर हाल में बनाए रखती है। यह किताब एक तरह से लखनऊ के ही हाथों लिखी गई है, कभी यह शहर इसमें लेखक होता है, कहीं किरदार, कहीं अपनी गोद में खेलनेवाले अवाम को गहरी करुणा से देखता हुआ, कहीं उन्हें बरजता, सिखाता हुआ। लखनऊ के इन क़िस्सों को लखनऊ के जिस शैदाई ने अपनी कलम दी है, उनका कहना है—‘यह अपने अतीत को सँभालकर रखता है, पर उसमें क़ैद होकर नहीं होता।’ इस किताब में लखनऊ के अनेक चेहरे हैं, अनेक रंगतें, बीती दुनिया की यादें भी और मौजूदा वक़्त के कुछ हवाले भी।
लखनऊ और उसके मिज़ाज का
एक याद रह जाने वाला ख़ाका बनाती है—जाने जाँ लखनऊ


