‘मामलुक’ यानी ग़ुलाम, मध्यकालीन भारत में जिनका व्यापार होता था। ग़ुलामों की ख़रीदारी और बिक्री के लिए बाक़ायदा व्यापारी होते थे; ऐसे ग़ुलाम जिनकी ना अपनी कोई मर्ज़ी होती थी, न ही कोई फ़ैसला। लेकिन वही ग़ुलाम अपनी बहादुरी, मानव-चरित्र और समाज की अपनी समझ, तथा क़ौम की रहनुमाई करने की अपनी क़ुव्वत के चलते सुल्तान भी बने। ‘मामलुक’ ऐसे ही एक सुल्तान की बहुत धीरज से ढूँढ़ी और कही गई दास्तान है, जिसका नाम हम सब जानते हैं—अयल-तिमिश यानी इल्तुतमिश।
अपने एक जलनखोर भाई की साज़िश के चलते इल्तुतमिश को तरुणाई के दिनों में ग़ुलामों के एक व्यापारी को बेच दिया गया; फिर शुरू हुआ ग़ुलामी का एक लम्बा सिलसिला। लेकिन इल्तुतमिश को यातना के उस लम्बे सफ़र ने तोड़ा नहीं, ग़ुलामी के हर अगले पड़ाव पर वह चमकता गया, और एक दिन देहली का सुल्तान हुआ।
यह उपन्यास आज के अफ़ग़ानिस्तान के एक शहर बल्ख़ से इल्तुतमिश के अमनपसन्द युद्ध-विरोधी पिता इलाम की हिजरत से आरम्भ होता है और इल्तुतमिश की बेटी रज़िया सुल्तान की तख़्तनशीनी तक पहुँचता है, जो अपने आपको सुल्ताना नहीं, सुल्तान कहलवाना पसन्द करती है।
उपन्यास के रूप में ‘मामलुक’ विशिष्ट इसलिए है कि उपन्यास विधा की सीमाओं को विस्तार देते हुए यह कृति पाठक को सल्तनल काल की एक विशाल चित्र-दीर्घा में ले जाती है जहाँ हम उस दौर के अनेक ऐतिहासिक चरित्रों, रीति-रिवाजों, शाही रहन-सहन से जुड़ी अनेक वस्तुओं से रू-ब-रू होते हैं और उस समय को उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता के साथ बिलकुल अपने आसपास महसूस करते हैं।


