प्रतिष्ठित इतिहासकार सुधीर चन्द्र की यह पुस्तक, ‘मिसराना मुहल्ला’, उनके बचपन के दिनों के उस स्थान का स्मरण है, जहाँ उन्होंने जन्म लिया और पले बढ़े। मैनपुरी का मिसराना मुहल्ला।
लगभग पचहत्तर साल बाद अपनी चेतना के एकदम प्रारम्भिक चरण की इन यादों में उन्होंने उस बहुत कुछ को अत्यन्त शिद्दत और अपनेपन के साथ याद किया है जो अब बचा नहीं है। बचा भी है तो कुछ लोगों के मन में एक टीस-जैसा।
इस स्मरण-यात्रा में वे अपने घर की पुरखिनों को ख़ासतौर पर याद करते हैं, और साथ ही उनके जीवन को, उनके सुख-दुख को नियंत्रित करने वाले पुरखों को भी, पितृसत्ता की उस संरचना को जहाँ स्त्रियाँ छायाओं-सी दिखाई देती हैं—लेकिन फिर भी घर को, परिवार को थामे हुए हैं। वंश-बेल को बचाने, बढ़ाने और अपनी यातना से सींचने वाली स्त्रियाँ।
उनके साथ जिस चीज़ को उन्होंने ख़ासतौर पर याद किया है, वह है भाषा, वे शब्द जो धीरे-धीरे जीवन से निकल गए। भाषा के साथ-साथ ही आपसी रिश्तों में जीती वह ऊष्मा जो गालियों को भी प्रेम की अभिव्यक्ति बना देती थी। और जीने का वह तरीक़ा जो था तो बहुत धीमा लेकिन जीवन से भरपूर था।
अपने मुहल्ले और परिवार के अतीत का यह सफ़र सिर्फ़ नॉस्टेल्जिया नहीं, एक व्यक्ति के निजी अनुभवों और अपने भोगे हुए यथार्थ के सहारे एक कालखंड का उत्खनन है। उसके तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और विरोधाभासों के साथ।


