निराला—हिन्दी साहित्य की एक असाधारण ऊँचाई का नाम है; और इस ऊँचाई में एकमेक हुआ है कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का लोक-मांगल्य और रवीन्द्र का सौन्दर्यबोध। किन्तु महत्तम व्यक्तियों के इस 'त्रिपिटक' में समाकर नहीं रह जाती यह ऊँचाई, बल्कि अपने अन्तर-बाह्य अन्धड़ों के बीच और भी उत्तुंग हो उठती है। निराला की साहित्य साधना का यह पहला खंड इसी ऊँचाई का जीवन्त साक्षात्कार करता है।
सामान्य अर्थों में यह ग्रन्थ निराला का जीवनी खंड या जीवन-चरित है, पर अपनी प्रस्तुति के नाते हिन्दी आलोचना के विभिन्न असामान्य आयामों का उद्घाटन करता है। रामविलास जी के शब्दों में—“यह एक साहित्यकार का जीवन-चरित है, इसलिए इसमें किसी हद तक उनके साहित्य का मूल्यांकन भी शामिल है, पर यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक, सामाजिक परिवेश से, उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”
वस्तुतः अनेक अल्पज्ञात और अज्ञात तथ्यों को उकेरती हुई यह पुस्तक निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व की जिस पारस्परिकता को उजागर करती है, वह विरल है। हिन्दी के आलोचना-साहित्य में सृजनात्मकता का ऐसा उच्छल प्रवाह, कवि-कृतित्व के जटिल और सूक्ष्म अन्तर्विरोधों से निःसृत कवि-कृतित्व का ऐसा मर्मस्पर्शी मूल्यांकन पहली बार सम्भव हुआ है।


