‘पाँव तले की दूब’ कथित सभ्य समाज की ओर से शोषण-उत्पीड़न की शक्ल में लम्बे समय से जारी उन अस्तित्वघाती हमलों को रेखांकित करता है जिनसे आदिवासी समाज निरन्तर जूझ रहा है। शासन-सत्ता की विकास-नीति आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों और संसाधनों को ही नहीं, प्रकृति के साहचर्य में रची-बसी उनकी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने पर तुली है। यह संकट उनके अन्धविश्वासों और रूढ़ियों से जुड़कर और भीषण हो उठता है। ऐसा नहीं है कि उनमें चेतना नहीं है, प्रतिरोध नहीं है; यह सब है लेकिन उनमें भी भटकाव आता है, वे भी भ्रमित होते हैं; अपने चारों तरफ छाये घटाटोप में कई बार वे अपने किसी हितचिन्तक को पहचानने में भी भूल कर बैठते हैं... इन उतार-चढ़ावों के बीच उनका जीवन-संघर्ष जारी है, उस दूब की तरह जो बार-बार कुचली जाने के बावजूद फिर से उग आती है।
एक लेखक और एक पत्रकार के ज़रिये कही गई, झारखंड के आदिवासी जनजीवन की यह कथा किसी भी संवेदनशील पाठक को बेचैन कर देगी।
प्रख्यात कथाकार संजीव के जनोन्मुख लेखन का अविस्मरणीय उदहारण!


