मंगलेश डबराल का पहला कविता संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' तीन दशक से ज्यादा समय बीतने के बावजूद अब भी अपने नितांत अलग स्वर, नये कथ्य और शिल्प की सघनता के लिए जाना जाता है और उसकी कविताएं पढ़ते हुए वह संवेदना फिर से जीवित हो उठती है, जिसने इन कविताओं को संभव किया था। सन् 1981 में इस संग्रह के प्रकाशन से एक ऐसा संसार हिंदी कविता में प्रकट हुआ जो यथार्थ, स्मृति और भूगोल की स्थानीयता को एक व्यापक समकालीन अनुभव में रूपांतरित करता था। इन कविताओं में वह विस्थापन भी पहली बार रेखांकित हुआ, जो पहाड़ की जीवन शैली में आनेवाले बदलावों और असंतुलित विकास प्रक्रियाओं का नतीजा था। अपनी स्थानीय जड़ों से उखड़ कर अजनबी शहरी परिवेश की तरफ बेदखल होते कवि के माध्यम से अभिव्यक्त हुई यह एक पूरे समाज की व्यथा-कथा थी। अपनी मूलभूमि और नयी शरणगाहों के बीच के तनाव और द्वंद्व की मार्मिक पड़ताल करने वाली इस कविता में विगत और आगत के, स्मृति और कल्पना के दो समय एक साथ उपस्थित थे और वह जैसे जर्मन कवि-नाटककार बर्टोल्ट ब्रेष्ट के शब्दों को दोहराती हुई लगती थी : 'पहाड़ की यातनाएं हमारे पीछे हैं और मैदान की यातनाएं हमारे आगे।'
ख़ास बात यह है कि मंगलेश डबराल की कविताएं इन दोनों विशेषताओं के साथ एक गहरी राजनीतिक चेतना से लैस रही हैं। इसीलिए उनमें सिर्फ़ आत्मलाप नहीं है, बल्कि बार-बार आत्म से बाहर जाकर व्यापक जन से जुड़ने और एक प्रतिबद्ध वैचारिक-राजनीतिक हस्तक्षेप बनने की इतनी शिद्दत है कि यहां 'भूख एक मुस्तैद पंजे में बदल जाती' है और 'सड़कें और टहनियां, पानी और फूल और संगीत' भी हथियारों का काम देने लगते हैं। मंगलेश डबराल बार-बार एक हताशा के भीतर से एक बुनियादी आशा ढूंढ लाते हैं, उसे बहुत मुखर हुए बिना एक वास्तविकता की तरह सामने रखते हैं और शायद यही वह सामर्थ्य है जिसके कारण उनकी कविता की अपनी मार्मिकता और प्रासंगिकता बची हुई है। आज जब यथार्थ के रूप बहुत बदल गये हैं, पहाड़ पर लालटेन का परिदृश्य हिंदी कविता में उसी तरह मौजूद है।


